शनिवार, 24 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...(4)

पिताजी के प्रयाण के बाद भी प्रभाकरजी के पत्र आते रहे, लेकिन पत्राचार की गति शिथिल होती गयी। सन् 1997 के जनवरी महीने में कुछ ऐसी विवशता आ पड़ी कि मुझे दिल्ली जाना पड़ा। 'विवशता' इसलिए कह रहा हूँ कि घर पर बीमार छोटी बहन को छोड़कर जाना पड़ा था, श्रीमतीजी भी अपनी नौकरी के कारण पटना से बाहर थीं, छोटे भाई और बड़ी बेटी के भरोसे घर छोड़ आया था। दिल्ली पहुँचकर मैं काम की भीड़-भाड़ और भाग-दौड़ में लग गया था, फिर भी मन की यह ज़िद थी कि प्रभाकरजी के दर्शन अवश्य करने हैं।
मैं वक्त निकालकर सुबह-सुबह उनके घर, अजमेरी गेट के पास, कुण्डेवालान पहुँचा। प्रभाकरजी बैठके में अपनी शय्या पर अधलेटे मिले। क्लांत दिखे, थोड़े कृश भी। प्रणाम करके मैं उनके पास ही सोफ़े पर बैठ गया और बातें करने लगा। मुझे देखकर उनके मुख-मण्डल पर दो क्षण के लिए प्रसन्नता की चमक दिखी और फिर फीकी पड़ गयी। मैंने पूछा--'क्यों, तबीयत ठीक नहीं है क्या?'
उन्होंने बुझी हुई आवाज़ में कहा--'जैसा प्रभु ने रख छोड़ा है, वैसा ही हूँ। शरीर की शक्ति बहुत घट गयी है। अब तो ठीक से लिखना-पढ़ना भी नहीं हो पाता।'

सिद्ध लेखक कुछ लिख न सके, अध्यवसायी कुछ पढ़ न सके तो वह पीड़ित होता है; क्योंकि वही तो उसकी जीवनव्यापी साधना होती है और मनोरंजन भी। यह मैं अपने अपने अनुभव से जानता हूँ। तब पिताजी को गुजरे एक साल दो-ढाई महीने ही हुए थे, वह भी अपने अंतिम दिनों में कहने लगे थे--'अब लिखना-पढ़ना कुछ हो नहीं पाता तो जीने की इच्छा नहीं होती।'... लिहाजा, जीना है तो कार्यक्षम रहते हुए जीना है और उसकी अनिवार्य शर्त लिखना-पढ़ना है।

प्रभाकरजी के मुख से ठीक यही बात सुनकर मुझे उनमें पिताजी दिखे। मैंने उनसे कहा--'बाबूजी भी यही कहने लगे थे, जब उनके लिए लिखना-पढ़ना कठिन होने लगा था।'
प्रभाकरजी ने आर्त्त स्वरों में कहा था--'मैं भी उन्हीं की राह पर हूँ आनन्द!'
फिर तो हमारी बातें पिताजी की स्मृतियों में खो गयीं। प्रभाकरजी पिताजी को याद करते हुए उनके संस्मरण सुनाने लगे कि 'जब वह मेरे घर दो दिनों के लिए ठहरे थे तो ऊपरी माले पर अपने कमरे में जाते हुए भयभीत हो जाते थे; क्योंकि उन्हें आँगन के बीचो-बीच लगी लोहे की जाली को पार करना पड़ता था, जिससे नीचे का भू-भाग दिखायी पड़ता था।'

पिताजी से सम्बद्ध कई प्रसंग सुनाते हुए प्रभाकरजी की कंथा दूर हो गयी थी, वह मुखर हो उठे थे और बीच-बीच में हँस पड़ते थे। उन्हें प्रसन्न और प्रकृतिस्थ हुआ देखकर मुझे खुशी हुई थी।...

हमारी यह मुलाकात लंबी खिंच गई। इस बीच मैंने अंदर से आयी चाय पी ली थी और कुछ भोज्य पदार्थ भी ग्रहण कर लिया था। अब मुझे लौटकर कुछ काम निबटाने थे और पटना के लिए रात की गाड़ी पकड़नी थी। चलने के ठीक पहले मैंने प्रभाकरजी से कहा--"आवारा मसीहा' कई साल पहले ही मार्त्तण्ड बाबूजी की लाइबरी से लेकर मैंने पढ़ी थी, लेकिन मैं चाहता हूँ कि उसकी एक हस्ताक्षरित प्रति मैं अपने पास सुरक्षित रखूँ। बहुत पहले आपने उसकी एक प्रति मुझे देने का आश्वासन भी दिया था।"

प्रभाकरजी 'ठहरो' कहते हुए बमुश्किल उठ खड़े हुए और धीरे-धीरे चलते हुए घर के अंदर दाखिल हुए। पाँच मिनट बाद ही वह वापस आये। उनके हाथ में एक नहीं, दो पुस्तकें थीं। वह शय्या पर बैठे, कलम उठायी और पुस्तक की जिल्दें पलटकर उस पर कुछ लिखने लगे। मैं कुतुहल-जड़ित शिशु-सा उन्हें देखता रहा। लिख लेने के बाद दोनों प्रतियाँ मुझे देते हुए बोले--"आवारा मसीहा' ही नहीं, तुम 'अर्द्धनारीश्वर' नाम का यह उपन्यास भी ले जाओ, पढ़ना इसे, अकादमी से पुरस्कृत ग्रंथ है यह !"

मैंने पुस्तकों को सिर नवाया, प्रभाकरजी के चरण छुए और चलने को उठा खड़ा हुआ तो उन्होंने कहा--"फिर जब कभी दिल्ली आना तो जरूर मिलना।' मैंने स्वीकृति दी, करबद्ध हो पुनः प्रणाम किया और चल पड़ा।...
(क्रमशः)

[चित्र : 'आवारा मसीहा' की प्रति और उस काल-समय का मैं.]

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-06-2016) को "हिन्दी के ठेकेदारों की हिन्दी" (चर्चा अंक-2649) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Rishabh Shukla ने कहा…

sundar