शुक्रवार, 23 जून 2017

श्रीविष्णु प्रभाकर, जो चलते चले गये...(3)


साहित्य की हर विधा में प्रभाकरजी ने प्रचुर लेखन-कार्य किया। उन्होंने नाटक लिखे, उपन्यास लिखे, कहानियाँ और कविताएँ लिखीं, तो जीवनी और भ्रमण-वृत्तांत भी लिखा। वह सर्वप्रिय साहित्यकार थे, हर दीर्घा, हर प्रकोष्ठ, हर गोलबंदी में उनकी पैठ थी और सर्वत्र उन्हें समादर प्राप्त था। अलंकरण-उपाधियों-सम्मानों की उन पर वर्षा हुई थी, लेकिन वह अनासक्त भाव से सब ग्रहण कर आगे बढ़ चले। राष्ट्रपति-भवन में हुए दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर उन्होंने 'पद्मभूषण' जैसी उपाधि लौटा दी थी और साहित्य जगत् में तहलका मच गया था। उनमें अभिमान लेश मात्र नहीं, किन्तु स्वाभिमान पर्याप्त मात्रा में था।

एक बार उन्हीं के पत्र से पता चला कि कोलकता के किसी आयोजन में सम्मिलित होकर वह अमुक ट्रेन से पटना होते हुए दिल्ली लौटेंगे, लेकिन पटना रुकेंगे नहीं। पटना के लिए एक दिन भी न निकाल पाने पर उन्होंने क्षोभ व्यक्त किया था। पत्र पिताजी को संबोधित था। मैंने पिताजी से कहा--'मैं स्टेशन जाकर ट्रेन में प्रभाकरजी से मिलना चाहूँगा।' पिताजी ने सचेत करते हुए कहा था--'ट्रेन तो थोड़ी देर ही रुकेगी और तुम्हें यह भी मालूम नहीं कि प्रभाकरजी किस कोच में सफ़र कर रहे होंगे। जब तक तुम उन्हें ढूँढ़ोगे, ट्रेन चल पड़ेगी।'

लेकिन, नियत तिथि को मैं सपत्नीक स्टेशन गया था और श्रीमतीजी के कहने पर प्रभाकरजी के लिए थोड़े फल और मिष्टान्न साथ लेता गया था। जैसा पिताजी ने कहा था, उस भीड़-भड़क्के में प्रभाकरजी को ढूँढ़ निकालने में थोड़ा वक्त तो जरूर लगा, लेकिन वातानुकूलित डब्बों की संख्या तीन-चार ही थी, हमने उन्हें खोज निकाला। अचानक मुझे सम्मुख उपस्थित देख प्रभाकरजी खिल उठे। वह सपत्नीक यात्रा कर रहे थे। हमने उन दोनों के चरण छुए। श्रीमतीजी चाचीजी के पास बैठकर बातें करने लगीं। प्रभाकरजी ने मुझसे कहा--'इतनी जहमत उठाने की क्या आवश्यकता थी? बस, दो घड़ी की मुलाकात के लिए तुम घर से इतनी दूर क्यों चले आये?' मैंने मुस्कुराते हुए कहा--'बहुत दिन हो गये थे, आपसे मिले हुए...और आप पटना से होकर गुजर रहे थे, मैंने सोचा, इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए।...और, मैं चला आया।'... मेरा उत्तर सुन प्रभाकरजी मुग्ध हुए और एक मीठी मुस्कान उनके अधरों पर खेल गयी।

हम दोनों की शक्लों पर मिल पाने का संतोष और स्वाभाविक प्रसन्नता मूर्त्त थी। श्रीमतीजी बातों में मशगूल, यह भूली बैठी थीं कि फल-मिठाई का पैकेट उन्हें देना भी है। मेरा ध्यान भी उस ओर नहीं गया। अचानक ट्रेन ने चलने के पहले सावधान करनेवाली सीटी बजायी। हम शीघ्रता से उतरने को तत्पर हुए और पुनः चरण स्पर्श को झुके, तब श्रीमतीजी को खाली हाथों की जरूरत पड़ी और उन्हें हाथ के पैकेटों का खयाल आया। उसे चाचीजी के सुपुर्द करते हुए उन्होंने कहा--'यह आपके लिए है!' तदनन्तर हड़बड़ी में प्रणाम कर वह आगे बढ़ीं और उनके पीछे मैं भी। पीठ पीछे से आती चाचीजी की आवाज हमें सुनाई पड़ी--'अरे साधना, तुम नाहक यह सब ले आयीं। कलकत्ता वालों ने इतना सारा खाने-पीने का सामान...!' और उनकी आवाज मद्धम होती हुई शोर-शराबे में विलीन हो गयी।...

स्नेहमयी चाचीजी से वही अंतिम मुलाकात थी हमारी। कालांतर में प्रभाकरजी की पुस्तक 'शुचि स्मिता' में उनकी मर्मस्पर्शी गाथा ही हमारे बीच रह गयी, जिसे पढ़कर मेरी आँखें सजल हो उठी थीं। वह ममतामयी माता भी संसार-सागर से विमुक्त हो गयी थीं।...

सन् 88 में अलीगढ़ में डाॅ. पाहवा से एक आँख की शल्य-चिकित्सा के उपरांत आँख पर हरी पट्टी बाँधे पिताजी दिल्ली गये थे और एक-दो दिनों के लिए प्रभाकरजी के अतिथि बने थे। सन् '95 में पिताजी के निधन के बाद प्रभाकरजी ने एक संस्मरणात्मक आलेख उन पर लिखा था, जो नवभारत टाइम्स की समस्त इकाइयों के संपूरक अंक में छपा था। वह अंक पटना में मुझे भी हस्तगत हुआ था, जिसे पढ़कर मैं भावुक हो गया था।...

पिताजी को लिखे उनके कई पत्रों की कतिपय पंक्तियाँ मर्मवेधी हैं। दरअसल, अपने उत्तर जीवन में उन्हें हृदयहीन व्यवसायियों से लोहा लेना पड़ा था जो उन्हीं के कुण्डेवालान स्थित घर के बाहरी परिक्षेत्र के पुश्तैनी किरायेदार थे। उनसे नाममात्र का किराया मिलता था और वे बहुत बड़े भू-भाग पर काबिज़ थे। कई निवेदनों-मनुहारों के बाद भी उसे खाली करने को वे तैयार नहीं थे। एक सहृदय साहित्यिक, एक संवेदनशील रचनाकार, एक भावुक कवि और एक कल्पनालोक में विचरण करनेवाले मसिजीवी के लिए यह जागतिक रस्साकशी प्राणांतक पीड़ा देने वाली थी। अपनी यह पीड़ा कई मुलाकातों में उन्होंने पिताजी के सम्मुख व्यक्त की थी और उनके पत्रों में भी इस पीड़ा के स्वर-संकेत उभर आते थे।...

पिताजी के निधन के बाद मेरे एक पत्र का उत्तर देते हुए उन्होंने 1 फरवरी 96 को लिखा था--"...काम तो मैं भी करता हूँ, पर अब थक गया हूँ। और कुछ समस्याएँ ऐसी, जिनका हल कब होगा, पता नहीं। भ्रष्टाचार के दावानल में इंसानियत तो समाप्त ही हो गयी। गुण्डा और पैसा दो ही साधन हैं। दोनों ही हमारी सीमा से बाहर हैं। अब जो होना होगा, हो जाएगा।
बस, एक ही बात है, मैं भी अब किनारे पर हूँ, पता नहीं कौन-सा क्षण अंतिम हो। बस यही चाहता हूँ, उस अंतिम क्षण तक जागृत रहूँ।..."

प्रभाकरजी के इस पत्र को पढ़कर मेरा मन व्यथित हुआ था। वह नितान्त सहृदय-निष्कलुष व्यक्ति थे, मैं नहीं जानता, प्रभु ने यह पीड़ा उन्हें क्यों दी थी। मैं यह भी नहीं जानता कि उनके जीवनकाल में उन्हें इस पीड़ा से मुक्ति मिली भी या नहीं।...
(क्रमशः)

[चित्र  : प्रभाकरजी का 1 फरवरी 1996 का वह मार्मिक  पोस्टकार्ड.]

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-06-2016) को "हिन्दी के ठेकेदारों की हिन्दी" (चर्चा अंक-2649) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'