रविवार, 30 अप्रैल 2017

वह एक अकेला दुर्लभ दर्शन...(2)

उन दिनों मेरी श्रीमतीजी साथ नहीं थीं। उन्होंने मेरी प्रथम कन्या को जन्म दिया था और वह अपने मायके में थीं। मैंने तब तक आचार्यश्री को शीतल जल ही पिलाया था और बातें सुनने में मशगूल हो गया था। अचानक पिताजी को ख़याल आया तो उन्होंने आदेश दिया-- 'वाजपेयीजी के लिए चाय-पान की कुछ व्यवस्था तो करो।' आदेश की पालना के लिए मैं उठने ही वाला था कि छोटे भाई लौट आये। आचार्यश्री के चरण-स्पर्श से उन्होंने भी वही प्रसाद पाया, जो मुझे मिला था। उन्होंने ही आचार्यश्री के जलपान और चाय की व्यवस्था की। मैं, आचार्यश्री और पिताजी की वार्ता का मूक श्रोता बना, वहीं, उन्हीं के आसपास रहा। बातें अनेक विषय-बिंदुओं का स्पर्श करती हुई फिर जयप्रकाशजी पर आ गयीं। पिताजी वाजपेयीजी को विस्तार से बताने लगे कि जब जयप्रकाशजी जसलोक अस्पताल, मुंबई में थे, तब अज्ञेयजी के अनुरोध पर वह उनके साथ मुंबई गये थे और लोकनायक से मिले थे।
पिताजी और जयप्रकाशजी की वार्ता भोजपुरी में शुरू होती, फिर अज्ञेयजी का ख़याल कर जे.पी. हिंदी में बोलने लगते और बातें हिंदी में होने लगतीं; किन्तु थोड़ी ही देर बाद पिताजी की ओर मुखातिब होकर जब जे.पी. कुछ कहने लगते तो भाषा स्वतः भोजपुरी हो जाती। ऐसा जब दो-तीन बार हुआ तो जे.पी. ने अज्ञेयजी से कहा-- 'मुक्तजी से मेरी बातचीत की भाषा वर्षों से भोजपुरी रही है, इसलिए...! आप कुछ ख़याल न कीजिएगा।' अज्ञेयजी ने प्रत्युत्तर में बस इतना कहा था--'भोजपुरी मैं बोल नहीं पाता, लेकिन समझता तो अच्छी तरह हूँ।...'
जयप्रकाशजी बड़े कष्ट में थे, लेकिन पिताजी-अज्ञेयजी को देखकर खिल उठे थे। उन्होंने कहा था--'कल तो डायलिसिस पर रहूँगा। परसों मिलकर ही जाइयेगा। आपलोग आ जाते हैं तो अच्छा लगता है।'...
आचार्यश्री पिताजी की बातें ध्यान से सुन रहे थे। पिताजी की बात पूरी हुई तो उन्होंने कहा--'बिल्कुल सत्य लिखा है आपने। जयप्रकाशजी तो दधीचि ही थे। देश और जनसेवा में उन्होंने सर्वस्व निछावर कर दिया--और तो और, अब निज देह भी अर्पित कर दी।'...
दो घण्टों की निरंतर वार्ता के बाद आचार्यश्री विदा लेने के लिए उठ खड़े हुए। मैंने विनम्रता से कहा--'कंपनी की गाड़ी आपको कनखल तक छोड़ देगी। मैं ड्राइवर को बुलाता हूँ अभी।' उन्होंने कहा--'रहने दीजिए, इसकी आवश्यकता नहीं। मैं पैदल चलने का अभ्यासी हूँ। जैसे आया था, वैसे ही चला जाऊँगा।'...और वह चले गये।

आचार्यश्री तो चले गये और मैं सोचता ही रहा कि प्राचीनकाल में ऋषि-कुल के तपी-तपस्वी, साधक तथा परम गुणी-ज्ञानी महापुरुष ठीक ऐसे ही रहे होंगे--आडम्बरविहीन, एकनिष्ठ, सरल-सहज, उदात्त! उन्होंने अपनी साज-सज्जा, वेशभूषा और प्रदर्शन-प्रियता से नहीं, अपनी प्रखर तेजस्विता और अनूठी-अगाध विद्वता से आचार्य-पद पाया था। उनका बाहरी आवरण और रूप-सज्जा चाहे जैसी रही हो, वह चाहे दीन-हीन, दरिद्र ही क्यों न दिखते हों, दुनिया उनकी चरण-वंदना में नतशिर रही। उन्होंने एक आलेख से पिताजी का पता पाया था और उस आलेख से इतने प्रसन्न-प्रभावित हुए थे कि स्वयं चलकर हमारे द्वार पर आ गये थे तथा हमें दर्शन और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया था।...
आचार्यश्री हिन्दी को शब्दानुशासन देने वाले 'हिन्दी के पाणिनी' थे। यह उपधि उन्हें उनके जीवनकाल में ही मिल गयी थी, जो सर्वस्वीकृत थी। 'हिन्दी, संस्कृत की नहीं, किशोरीदास की बेटी है'--यह गर्वोक्ति नहीं, आधिकारिक उद्-घोषणा थी आचार्यश्री की। और, ऐसी बात कहने का साहस सिर्फ वही कर सकते थे।
कुछ समय बाद पिताजी कनखल जाकर आचार्यश्री से
मिल आये थे, मैं ही अपनी कार्यालयीय व्यस्तताओं में उलझा रहा और पुनः उनके दर्शन का अवकाश न निकाल सका। आचार्यश्री के पुनर्दशन से लौट आने के बाद पिताजी ने बताया था कि "वाजपेयीजी 'काव्यानुशासन' नामक एक वृहत् ग्रंथ के प्रणयन की कार्य-योजना पर काम कर रहे हैं और उनकी समस्त चिंता यही है कि अपने जीवन काल में यह काम वह पूरा कर सकें। गजब जीवट के महानुभाव हैं वाजपेयीजी भी! लेकिन, मुझे नहीं लगता कि उम्र की इस दहलीज पर, आँखों की इस दशा में और शरीर की सीमित हो रही शक्ति से वह यह काम पूरा कर सकेंगे।" और हुआ भी यही। आचार्यश्री हिन्दी को 'काव्यानुशासन' दे न सके।... लेकिन जितना कुछ वह हिन्दी, हिन्दी-व्याकरण और ब्रजभाषा को दे गये हैं, उतना तो बड़ी-बड़ी संस्थाएँ भी अपने दीर्घ कार्यकाल में नहीं दे पातीं।...

छह महीने बाद प्यारी-सी बेटी के साथ श्रीमतीजी मायके से लौट आयीं। ज्वालापुर की आबोहवा पिताजी को अनुकूल नहीं पड़ रही थी। सन् 80 के जाड़ों में वह पटना लौट गये। मैं दफ़्तर के कामों, घर-गृहस्थी की उलझनों और बिटिया के लाड़-प्यार से आबद्ध रहा और आचार्यश्री के एक और दर्शन-लाभ की बात बस सोचता ही रहा। बात आज-कल पर टलती रही।...
सन् 1981 में, जब मैं दिल्ली गया हुआ था, एक दिन अकस्मात् समाचार पत्रों से ज्ञात हुआ कि आचार्य किशोरीदास वाजपेयी का 83 वर्ष की आयु में निधन (12-8-1981) हो गया है और अमुक समय और स्थान पर उनकी अंत्येष्टि होगी। जब उनकी जरा-जर्जर काया की झुर्रियों और लकीरों को, रग-रेशों को अग्नि की लपलपाती जिह्वा मिटा रही थी, मैं अपने मालिकों के साथ मीटिंग में व्यस्त था। आचार्यश्री के पुनः दर्शन न कर पाने का क्षोभ मुझे सालता रहा। वह एक अकेला दुर्लभ दर्शन ही अंतिम दर्शन सिद्ध हुआ।...
(समाप्त)
(चित्र : 1. प्रौढ़ावस्था के आचार्यश्री 2. मैं और मेरी ज्येष्ठ कन्या, उसी काल और परिसर की छवि, जहाँ आचार्यश्री पधारे थे।)

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

वह एक अकेला दुर्लभ दर्शन...

वह मेरी नयी नौकरी थी। वहाँ अकेले रहते हुए मुझे एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था। मरे पास ज्वालापुर (हरद्वार) आने के लिए जिस रात (8 अक्तूबर, 1979) पिताजी ने दिल्ली से ट्रेन पकड़ी, उसी रात लोकनायक जयप्रकाश नारायणजी के अवसान की मार्मिक सूचना उन्हें मिली थी। उनकी यात्रा की वह रात कष्टप्रद बीती। उनका मानसिक उद्वेलन चरम पर था। उस रात वह डोर टूटी थी, जिससे पिछली आधी शती से पिताजी जयप्रकाशजी से अविच्छन्न रूप से जुड़े-बँधे थे।...
हरद्वार स्टेशन पर मैं उपस्थित था, उन्हें घर ले आया। पिताजी क्लांत थे--शरीर से और मन से भी! जयप्रकाशजी का विछोह उनके लिए बड़ा आघात था। स्नान-ध्यान और भोजनोपरांत यथानियम वह दिवानिद्राभिभूत हुए। मैं अपने दफ़्तर चला आया, जो मेरे आवास से बस इतनी ही दूरी पर था कि दफ़्तर में बैठे-बैठे जब चाहूँ, तब घर का मुख्यद्वार देख लूँ। शाम पाँच बजे मैं घर आया तो मैंने देखा पिताजी कुछ लिख रहे हैं। मैंने पूछा--'चाय पी ली आपने?' उन्होंने कहा--'हाँ, शम्भु चाय पिला गये हैं। कह गये हैं कि अभी आता हूँ।' मैंने पुनः प्रश्न किया--'क्या लिख रहे हैं आप? आज तो आराम कर लेते!'
उन्होंने किंचित् क्षोभ के साथ कहा था--'जयप्रकाशजी की स्मृतियाँ विचलित कर रही हैं। उन्हीं के बारे में लिख रहा हूँ।' जब वह आलेख सम्पन्न हुआ, मैंने उसे पढ़ा। वह जयप्रकाशजी पर लिखा पिताजी का अत्यंत मार्मिक संस्मरण था--'एक और दधीचि : लोकनायक जयप्रकाश नारायण'। प्रायः एक महीने बाद वह संस्मरण 'कादम्बिनी' या 'नवनीत' में प्रकाशित हुआ था। संस्मरण के अंत में लेखक का तत्कालीन नया पता भी छपा था। रजिस्टर्ड डाक से हमें उसकी प्रति प्राप्त हुई थी। जयप्रकाशजी के अवसान की मर्मंतुद पीड़ा और अवसाद को पिताजी ने अपनी लेखनी-चंचु से मूर्त्त कर दिया था उस संस्मरण में।...
जहाँ तक याद है, उस आलेख के प्रकाशन के दस-पन्द्रह दिन बाद (नवम्बर 1979 के अंत में) की ही बात है। दिन के दस-ग्यारह बजे होंगे, मैं दफ़्तर की अपनी कुर्सी पर था और कंपनी की खता-बही के किसी नीरस अंकगणितीय दायित्व से निबट रहा था। अनुज यशोवर्धन बाजार चले गये थे और घर में सिर्फ पिताजी और छोटी बहन ही थीं। तभी ऑफिस ब्वाय ने मेरे कक्ष में प्रवेश किया और कहा--'साब! कोई बूढ़ा आदमी आपके घर की घण्टी बजा रहा है और कोई दरवज्जा खोल नहीं रहा। मैं देखूँ क्या साब?'
मैंने दफ़्तर के शीशों से घर की ओर देखा। एक वृद्ध सज्जन द्वार पर खड़े थे और काॅलबेल का स्विच दबा रहे थे। प्रथमद्रष्टया वह मुझे किसी याचक-से लगे। मैंने सेवक को कक्ष के द्वार पर रुकने का आदेश दिया और स्वयं घर की ओर क्षिप्रता से बढ़ा। जब आगंतुक के थोड़ा निकट जा पहुँचा तो मैंने गौर से देखा उन्हें। वयोवृद्ध सज्जन थे--आँखों पर कमानीदार चश्मा था, कोटर में धँसी किशमिशी हो गयीं आँखें थीं, बेतरतीब छोटे-घने केश थे, बड़ी-बड़ी मूँछें थीं, मटमैली धोती, आधी बाँहों की गाँधीगंजी और एक बंडी, जिसका एक भी बटन बंद नहीं था तथा एक हाथ में लट्ठ धारण किये हुए वे कोई प्राचीनकाल के अपरिचत वृद्ध पुरुष लग रहे थे।
ये तो अच्छा हुआ कि मैं जब उनके सन्निकट जा पहुँचा तो मैंने नम्रता से ही पूछा--'किनसे मिलना है आपको?' मेरे प्रश्न का उत्तर न देकर उन्होंने थोड़े रोषपूर्ण स्वर में कहा--'घर जब अंदर से बंद है तो कोई खोलता क्यों नहीं? मैं कब से घण्टी बजा रहा हूँ।'
मैंने पुनः पूछा--'आपको मिलना किनसे है?'
वृद्ध अपनी टेक छोड़ने को तैयार नहीं थे, तपाक से बोले--'भई, मुझे तो यही घर बताया था गेटमैन ने मैनेजर का। यही है न?'
मैं कुछ कहता, उसके पहले ही प्रभु की बड़ी कृपा हुई कि पिताजी ने द्वार खोल दिया। पिताजी को देखने से ही स्पष्ट था कि वह स्नानागार से बाहर आये थे, उनके केश भीगे और बिखरे हुए थे तथा एकमात्र गीला तौलिया उन्होंने कमर में लपेट रखा था। लेकिन जैसे ही पिताजी की दृष्टि आगंतुक वृद्ध सज्जन पर पड़ी, वह प्रायः चौंक पड़े। तेजी से आगे बढ़कर पिताजी उनके पाँव छूने को यह कहते हुए झुके--'अरे, आचार्यश्री आप? क्षमा करें, मैं स्नानगृह में था।...'
लेकिन आचार्यश्री ने पिताजी को अपने चरणों तक पहुँचने नहीं दिया। उन्होंने बीच में ही उनकी बाहें थाम लीं। पिताजी ने मुझसे कहा--'तुम देखते क्या हो? आचार्य किशोरीदास वाजपेयीजी हैं, चरण-स्पर्श करो।' आचार्यश्री के मुझे कभी दर्शन नहीं हुए थे, लेकिन उनके नाम-गौरव से मैं खूब परिचित था। श्रद्धापूर्वक मैंने उनके चरण छुए और अपनी पीठ पर एक धौल का औचक आशीष पाया। पिताजी ने कहा--'मेरे ज्येष्ठ पुत्र हैं आनन्दवर्धन!'
आदरपूर्वक हम उन्हें घर के अंदर ले चले। छोटा-सा आँगन पार करते हुए पिताजी ने आचार्यश्री से कहा--'आपने क्यों कष्ट किया? मैं जब दिल्ली से चला था, तभी मैंने योजना बना ली थी कि आपके दर्शन करूँगा। मैं तो स्वयं आता आपके पास।'
इतनी बात कहते-कहते पिताजी के साथ हम दोनों बारामदे में पहुँच गये थे। पिताजी की बात सुनते ही वाजपेयीजी वहीं ठिठक गये और बोले--'लेकिन, मेरी योजना तो आपके जयप्रकाशजी वाले संस्मरण ने ही बना दी, फिर मैं रुक न सका। आपका पता उसी में था। मैं अपनी योजना को पूरा करने आज ही चल पड़ा। अद्भुत लिखा है आपने। जयप्रकाशजी की स्मृतियों के साथ वह संपूर्ण कालखण्ड जीवित रहेगा इस संस्मरण में।' आचार्यश्री के श्रीमुख से अपने संस्मरण की प्रशंसा सुनकर पिताजी ने शिष्टतावश विनम्रता से कहा--'वाजपेयीजी, मैं अकिंचन सामान्य मसिजीवी...!'
पिताजी का वाक्य अभी पूरा भी न हुआ था कि आचार्यश्री के लट्ठ की एक भरपूर चोट भूमि पर हुई--'धम्म!' और, वह बोल पड़े--'जिस व्यक्ति का नाम मैं पिछले पचास वर्षों से जानता-पढ़ता रहा हूँ, वह भला अकिंचन, सामान्य मसिजीवी कैसे हो सकता है? आप ऐसा तो न कहिये...।'
आचार्यश्री की बात के बाद कोई कुछ कह भी क्या सकता था? वह पिताजी से बारह वर्ष बड़े थे, अधीतशास्त्र थे, विख्यात व्याकरणाचार्य थे और उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तथा पूरी बीसवीं सदी की समस्त साहित्यिक गतिविधियों के साक्षी भी थे। परिणत वय में संयोगवश मुझे उनके दर्शन का एकमात्र सौभाग्य मिला था। जब पिताजी के कमरे में व्यवस्थित होकर वह बैठे गये और पिताजी से उनकी वार्ता मेरी पहुँच के बाहर के गंभीर विषयों का आस्वाद लेने लगी, तो मैं मौन साधकर ध्यान से आचार्यश्री की बातें सुनने और उनको देखने लगा। उनका चेहरा झुर्रियों और लकीरों का सघन वन था। दीर्घकाल के संघर्षमय जीवन और अनवरत साहित्य-साधना ने उनकी काया पर इतने निशान छोड़े थे कि कुछ न पूछिये, लेकिन विद्याविलासी आचार्यश्री की वाणी में 81 वर्ष की अवस्था में भी वही खनक थी, वैदुष्य की गहरी छाप थी, प्रखर वाग्मिता थी। अपनी स्थापनाओं के पक्ष में वह तब भी पूरी दृढ़ता से खड़े थे। अक्खड़ और ठेठ देशज व्यक्तित्व था उनका। पहली बार दूर से देखकर मैंने ही उन्हें एक याचक समझने की भूल की थी। सज्जनता-सरलता भी ऐसी कि उन्हें अपनी ही वेशभूषा और दीन दशा की सुधि नहीं थी। अचानक मेरी नज़र उनके पुराने चश्मे पर पड़ी। चश्मे की एक कमानी नदारद थी, जिसे उन्होंने एक डोरी से कान पर बाँध रखा था।...
(क्रमशः)
(चित्र : 'दिनमान' का आवरण-चित्र : आचार्य किशोरीदास वापेयी.)

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

वो शोला था, जल बुझा...'(2)

(वो गुज़रा हुआ ज़माना...)

याद आता है कि पाँच-छह वर्ष बाद पिताजी, अज्ञेयजी के साथ मिलकर, जब पटना से मासिक 'आरती' का संपादन-प्रकाशन कर रहे थे, तब भी किसी अन्य देश से भेजा हुआ सत्यनारायणजी का एक लेख 'आरती' में छपा था, जिस पर अज्ञेयजी और पिताजी की अलग-अलग कोष्ठकों में टिप्पणियाँ थीं। वह द्वितीय विश्वयुद्ध का काल था। विश्व-परिदृश्य पर अज्ञेयजी की टिप्पणी थी और लेखक के व्यक्तित्व-कृतित्व पर पिताजी की। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका जब चरम पर पहुँची तो सत्यनारायणजी स्वदेश लौट आये थे और एक दिन आरती-कार्यालय (पटनासिटी) में पहुँचकर उन्होंने पिताजी को चकित कर दिया था। युद्ध की आग जब शांत हुई तो वह पुनः प्रवासी हुए।...
18 अगस्त 1945 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस जब हवाई जहाज के साथ विलुप्त हो गये और ऐसी अपुष्ट खबरें रेडियो-अखबारों में आने लगीं तो सत्यनारायणजी बहुत मर्माहत हुए। उनके लिए इन समाचारों पर विश्वास करना कठिन था। नेताजी सुभाषचंद्र बोस के ऐसे रहस्यमय ढंग से गुम हो जाने से देश ही नहीं, पूरे विश्व में खलबली मची हुई थी। लेकिन सत्यनारायणजी के लिए मूक दर्शक बने रहना संभव नहीं था। वह उठ खड़े हुए इस संकल्प के साथ कि नेताजी के सत्य-सूत्र को खोजकर ही स्थिर होंगे। इस संकल्प-पूर्ति में उन्होंने अपने आपको झोंक दिया था। एक आग उनके अन्दर जल उठी थी। जाने किन प्रयत्नों से उन्होंने कई-कई देशों की यात्राएँ कीं, जंगलों-पहाड़ों की खाक छानी, जेल में डाले गये, यातनाएँ सहीं और अंततः फ्रांस पहुँचकर उन्होंने एक पुस्तक लिखी--'नेताजी इज़ वेरी मच एलाइव'।
पिताजी ने मुझे बताया था कि उन दिनों यह पुस्तक बहुत चर्चा में रही थी और हाथों-हाथ उसकी प्रतियाँ बिक गयी थीं। बाद में उसका अनुवाद फ्रेंच भाषा में भी हुआ था। जहाँ तक स्मरण है, पिताजी ने ही मुझसे कहा था कि एक बार किसी देश से पलायन के लिए वह एक को-पायलट को भ्रम में डालकर स्वयं उसके साथ हवाई जहाज ले उड़े थे। यह उनके पराक्रम की पराकाष्ठा थी।


सत्यनारायणजी जिन देशों में गये, वहाँ की भाषा जाने किस मनोयोग से उन्होंने सीख लीं। वह बहुभाषाविद् थे। अंगरेजी-हिन्दी तो पहले से ही उनकी आयत्त भाषाएँ थीं, विदेशों के प्रवास में उन्होंने जर्मन, फ्रेंच, रशियन भाषाएँ सीखीं और उन पर अधिकार प्राप्त किया।
जब देश स्वतंत्र हुआ तो सत्यनारायणजी स्वदेश लौटे। नेहरूजी ने उन्हें संसद में स्थान दिया। बहुत बाद में पटना के मारवाड़ी आवास गृह के स्वत्वाधिकारी श्रीविनोदकृष्ण कानोडियाजी ने मुझे बताया था कि जब ख्रुश्चोव-पुश्किन अपने शिष्टमण्डल के साथ भारत आये थे, तब नेहरूजी से उनकी वार्ता के बीच मध्यस्थता और दुभाषिये का दायित्व सत्यनारायणजी ने ही निभाया था।
1990-92 में सत्यनारायणजी पाँच-छह महीनों में दो-तीन बार पटना आये थे। वह जब भी आये, फ्रेजर रोड पर अवस्थित मारवाड़ी आवास गृह में ठहरे और उनकी दिन-भर की बैठक मेरे घर में पिताजी के पास लगती रही। एक दिन पिताजी ने मुझे उनके पास भेजा, कुछ आवश्यक प्रपत्र उन्हें सौंपने थे। मैं जब उनके कमरे में पहुँचा तो वह एक पुस्तक पढ़ने में तल्लीन थे। मुझे देखकर प्रसन्न हुए, बोले--'बैठो, तुम्हें एक महत्वपूर्ण प्रसंग सुनाता हूँ।' और बिना किसी भूमिका के उन्होंने उसी पुस्तक से पाठ शुरू कर दिया। मेरी ओर देखे बिना वह धाराप्रवाह जो कुछ पढ़ते जा रहे थे, उसका एक अक्षर भी मेरी समझ से परे था। एक पृष्ठ के पाठ तक मैंने धैर्य बनाये रखा, अंततः मुझे बोलना पड़ा--'आप जो पढ़ रहे हैं, उसे मैं बिलकुल समझ नहीं पा रहा हूँ।'
मेरे हस्तक्षेप से उनका ध्यान भंग हुआ। चौंककर बोले--'ओह, तऽ काँहें ना कहलऽ जी? साँचे तऽ, ई कितबिया तऽ फ्रेंच में बा, तोहरा समझ में आइत कइसे?' (ओह, तो कहा क्यों नहीं जी? सच में, पुस्तक तो फ्रेंच में है, तुम्हें समझ में आती कैसे?)
उसके बाद उन्होंने वह पुस्तक मुझे दिखायी। वह फ्रेंच भाषा की पुस्तक थी, जिसमें किसी का उनपर लिखा एक लंबा आलेख उनके चित्र के साथ छपा था। उस पुस्तक को उलट-पलटकर मैंने देखा। उनके चित्र को पहचान लेने के अलावा और मेरी समझ में क्या आने वाला था? उन्हें पुस्तक लौटाते हुए मैंने कहा--'आपने इतनी सारी भाषाएँ कैसे सीख लीं?'
वह मुस्कुराये और बोले--'परिश्रम, मनोयोग और लगन से। कुछ भी सीखने की पक्की लगन होनी चाहिए।' इतना कहकर वह गंभीर हो गए और मेरे पितामह का स्मरण करते हुए बोले--'लेकिन तुम्हारे बाबा ने मुझसे ठीक ही कहा था। यह सच है, मैंने कई भाषाएँ सीखीं, लेकिन संस्कृत से दूरी बनी ही रह गयी, उसपर मैं अधिकार नहीं पा सका। शास्त्रीजी देव-तुल्य व्यक्ति थे। उन्होंने बहुत पहले ही मुझे आगाह किया था कि संस्कृत मेरे अधीन नहीं होगी। बाद में विदेशों में भ्रमण करते हुए मुझे इसका अवसर भी नहीं मिला। संस्कृत मेरे लिए दुःसाध्य और दुरूह ही बनी रह गयी।'
सत्यनारायणजी का मुझे वही अंतिम दर्शन मिला था। उसके एक-दो वर्ष बाद ही वह संसार के लिए दुर्लभ-दर्शन हो गये थे। उनका तेजस्वी जीवन पराक्रमपूर्ण था। वह शोलों की तरह जले, धधके, चमके और अपनी प्रभा बिखेरकर अंततः अस्तंगत हो गये। उनके निधन का समाचार भी सुर्खियाँ नहीं बना। संभवतः उन्हीं के एक-दो वर्ष बाद पिताजी भी लोकांतरित हुए थे।...
सत्यनारायणजी पर कुछ लिखने की उत्कंठा-लालसा बहुत थी, लेकिन तथ्यों का नितांत अभाव था। उनके चौथेपन में मिले तीन-चार दर्शनों और थोड़ी-सी बातचीत की पूँजी ही तो थी मेरे पास। शेष सब पिताजी से जानी-सुनी बातें थीं, यत्किंचित् पढ़े हुए तथ्य भी थे! इसी पर आधारित है यह संस्मरण, जिसमें काल-क्रम और तथ्यों के उलटफेर से मैं इनकार नहीं कर सकता। सोचता हूँ, उन्हें निकट से जाननेवाले कोई महानुभाव उनका जीवन-चरित लिखते तो आनेवाली पीढ़ियाँ उसे पढ़तीं और अनुप्राणित होतीं।...
अब तो नेताजी की गुमशुदगी पर इतना कुछ लिखा और कहा गया है तथा नेट पर इतनी अधिक सामग्री उपलब्ध है कि उसकी भीड़ में सत्यनारायणजी के लेख और उनकी पुस्तक को ढूंढ निकालना असंभव हो गया है। सत्यनारायणजी, जो नेताजी समकालीन तो थे ही, उसी काल में विदेशों में भ्रमणशील भी थे। उन्होंने नेताजी की तलाश में लंबी दौड़ भी लगायी थी। उनका आलेख अथवा उनकी पुस्तक अधिक प्रामाणिक सिद्ध होती। सच है, कँगूरे दीखते है, नींव की ईंटें नहीं दीखतीं। इतना ही कह सकता हूँ कि वह धुन का धनी एक दहकता हुआ शोला था, जो जल बुझा।...
(समाप्त)

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

'वो शोला था, जल बुझा...'

(वो गुज़रा हुआ ज़माना...)
[कभी-कभी बड़ा अजीब होता है न! बीस-पचीस वर्षों का वक्त गुजरता है और स्मृतियाँ इतनी धुँधली हो जाती हैं कि किसी की शक्ल याद आती है, बातें याद आती हैं, किसी अलबम के पन्नों-सी पलटती सम्मुख आती जाती हैं उसकी अनेक मुद्राएँ और चलचित्र-सा दमकने लगता है उसका पूरा व्यक्तित्व; लेकिन नहीं याद आता तो उसका नाम और मन विचलित हो उठता है। मेरे साथ ऐसा ही हुआ है इस प्रसंग में। मैंने अनेक प्रयत्न किये, पुराने कगज-पत्तर पलटे, कई-कई फोन किये, पूना में बैठे-बैठे कई लोगों को प्रेरित किया, पूछा; लेकिन सब व्यर्थ हुआ। पटना जाकर, स्वयं उत्खनन करके, 'बिजली' की पुरानी फाइल से, मैं खोज लाया हूँ उनका नाम--डाॅ. सत्यनारायण सिंह (सिन्हा); जिन पर मुझे लिखना था यह स्मृति-लेख। क्योंकि, नाम के बिना इस संस्मरण की राह खुलती भी तो कैसे?
(--आनन्दवर्धन.)]
स्वतंत्रता-सेनानी सत्यनारायण सिंह...
वह तो 'मुक्त-कुटीर' था। घर का मुख्य-द्वार सुबह एक बार जो खुल जाता तो देर रात तक खुला ही रहता। आगंतुक आते, बैठते, पिताजी मिलते, बातें करते, सुख पाते और लौट जाते। दोपहर का थोड़ा-सा वक़्त छोड़कर सारे दिन घर में हलचल बनी रहती और मेरी श्रीमतीजी चाय-जलपान के प्रबंधन में जुटी रहतीं।
यह 1990-92 की बात है। एक दिन सुबह के नौ बजे एक सज्जन बेधड़क उसी प्रवेश-द्वार से घर में प्रविष्ट हुए, जोरदार पुकार लगते हुए--"परफूल, घरवा में बाड़ऽ का हो? ए परफूल, केने बाड़ऽ हो?
'परफूल ?' पिताजी को 'प्रफुल्ल' कहकर पुकारनेवाले लोग तो दुनिया से जाने कब के कूच कर गये थे, फिर यह कौन सज्जन हैं जो इस तरह पिताजी को पुकार रहे हैं? मैं तेजी से द्वार की ओर बढ़ा, लेकिन आगंतुक तो प्रवेश करके अंदर आ चुके थे। पिताजी के हमउम्र थे और वैसे ही सुदर्शन भी--श्वेतकेशी, धवल धोती-कुरते और बंडी में सुशोभित! अपनी शक्ल पर प्रश्नचिह्न लिए मैंने कुछ पूछना चाहा, लेकिन इसका अवकाश उन्होंने मुझे नहीं दिया और यह पूछते हुए आगे बढ़ चले कि 'प्रफुल्ल कहाँ हैं भाई?'
अपने नाम की ऐसी पुकार सुनकर पिताजी भी सचेत हो गए थे। वह अपने आसान से उठकर खड़े हुए ही थे कि उनके कमरे के दरवाजे पर आगंतुक जा खड़े हुए। उन्होंने गर्मजोशी से पूछा--"का हो परफूल, चीन्हलऽ? हम सत्यनारायण !"
पिताजी पहचानने की चेष्टा में दो क्षण गौर से उन्हें देखते रहे, फिर हुलसकर गले जा मिले। मैंने देखी थी उन दोनों के मिलन की वह प्रसन्नता, उत्कट उछाह की वह विकलता! उन्हीं के बताने से इतना तो मैं जान ही चुका था कि वह बुजुर्ग कोई 'सत्यनारायणजी' हैं, लेकिन उनका इतिवृत्त कुछ ज्ञात नहीं था।
पिताजी के कक्ष में सत्यनारायणजी जो जमे तो सुबह से शाम हो गयी और वार्ता का अंत न हुआ। दोपहर का भोजन और शाम की चाय भी उसी कमरे में पहुँच गयी। रात आठ बजे सत्यनारायणजी यह कहकर घर से विदा हुए कि कल वह फिर आयेंगे। रात के भोजन के वक्त मैंने पिताजी से उनके बारे में जिज्ञासा की। उन्होंने थोड़े क्षोभ से कहा था--'सत्यनारायण तो बहुत तेजस्वी और पराक्रमी व्यक्ति रहे हैं, लेकिन लगता है, अब चुक रहे हैं और उनके मस्तिष्क में विचलन और चिंतन में विश्रृंखलन भी आने लगा है। वह सम्बद्ध-असम्बद्ध बातें बोलने लगे हैं और ये अच्छे लक्षण नहीं हैं।' इसके अतिरिक्त पिताजी ने जो कुछ बताया, उसे संक्षेप में कहूँ, तब भी कथा थोड़ी विस्तृत ही होगी। लेकिन यह कथा मुझे कहनी होगी, क्योंकि वह जितनी रोचक है, उतनी ही रोमांचकारी भी।...
सत्यनारायणजी पिताजी की किशोरावस्था के मित्र थे, लेकिन सत्तर वर्षों की दीर्घकालिक मित्रता के दौरान पाँच या छह बार ही वह पिताजी से मिले थे और रह-रहकर लंबे अंतराल के लिए अलभ्य हो जाते थे। वह पिताजी के समवयसी थे। उनका पूरा नाम था-- सत्यनारायण सिंह (सिन्हा)। बिहार के छपरा-सीवान के आसपास के रत्न थे। पहली बार मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में (सन् 1925) वह घर से विद्रोह करके इलाहाबाद, मेरे पितामह (साहित्याचार्य पं. चंद्रशेखर शास्त्री) के पास, संस्कृत-ज्ञान-लाभ की पिपासा लेकर आये थे। प्रायः एक महीने तक वह पिताजी के साथ ही रहे और पितामह को अपनी विद्या-बुद्धि से प्रभावित करने की हर संभव चेष्टा करते रहे। इन्हीं पचीस-अठाइस दिनों में उनकी पिताजी से ऐसी घनिष्ठता हुई जो आजीवन बनी रही।

मासांत होते-होते एक दिन पितामह ने सत्यनारायणजी को अपनी बैठक में बुलाया। पिताजी छाया की तरह उनके साथ ही थे। सत्यनारायणजी कौतूहल-जड़ित किशोर की तरह पितामह के सम्मुख करबद्ध आ खड़े हुए, जैसे कोई परीक्षा-फल घोषित होनेवाला हो। धीर-गम्भीर स्वरों में पितामह बोले--'सत्यनारायणजी! मैं अपनी बात स्पष्ट शब्दों में कहूँगा। संस्कृत देव-भाषा है। सबकी जिह्वा पर चढ़ती नहीं, मुख से कढ़ती नहीं। संस्कृत-ज्ञान-समुद्र में गहरे उतरने के योग्य नहीं है अभी आपकी जिह्वा। आप किसी दूसरी दिशा में बढ़ने का यत्न करें, यही उचित होगा।'
जिस आशा और उत्साह से सत्यनारायणजी पितामह के पास आये थे, उसे ठेस लगी थी। पितामह अपनी बात पूरी कर चुके थे, वहाँ खड़े रहने का कोई औचित्य नहीं था। क्योंकि पितामह अक्सर कहा करते थे--'रामो द्विर्नाविभासते'--राम दो बार नहीं बोलते। उनका रोबो-दाब भी ऐसा था कि किसी को उनसे आग्रह-दुराग्रह करने का साहस नहीं होता था। लेकिन जब सत्यनारायणजी वहीं स्थिर खड़े दिखे तो पितामह ने पूछा--'तब क्या विचार है, क्या करना चाहेंगे आप?'
सत्यनारायणजी ने दृढ़ता से उत्तर दिया--'मैं देश-सेवा के काम करना चाहूँगा।'
इतना कहकर सत्यनारायणजी पिताजी के साथ वहाँ से हट गये। रात बीती और सुबह हुई, लेकिन तब तक सत्यनारायणजी नदारद हो चुके थे। अनुमान किया गया कि वह मुँहअंधेरे उठकर कहीं चले गये थे। गये तो ऐसे गये कि वर्षों उनका कुछ पता नहीं चला। न कोई चिठ्ठी-पत्री, न संदेश, वह तो गायब ही हो गये!...
फिर बारह-तेरह साल बीत गए। इस बीच बहुत कुछ बदल गया। पितामह लोकांतरित हुए, पिताजी इलाहाबाद छोड़ पटना आ बसे और उन्होंने वहाँ से साप्ताहिक पत्रिका 'बिजली' निकाली। पत्रिका चल निकली। प्रतिदिन ढेरों डाक आने लगी।
यह संभवतः 1937 की बात होगी। द्वितीय विश्वयुद्ध की सुन-गुन शुरू हो गयी थी। एक दिन पिताजी 'बिजली' की डाक छाँट रहे थे कि एक मोटे-से लिफाफे पर उनकी नज़र ठहर गयी। वह लिफाफा जर्मनी से भेजा गया था। उस पर 'बिजली'-कार्यालय का पूरा पता लिखा हुआ था। पिताजी को आतुर जिज्ञासा हुई कि ये कौन सज्जन हैं जिन्होंने जर्मनी से पत्र भेजा है, वह भी इतना भारी-भरकम! उन्होंने शीघ्रता से लिफ़ाफ़ा खोला और यह देखकर चकित रह गये कि पत्र-प्रेषक और कोई नहीं, वर्षों के बिछड़े बंधु सत्यनारायण थे। पिताजी को परम आश्चर्य हुआ कि वह जर्मनी कैसे जा पहुँचे? युद्ध की विभीषिका के कई चित्रों के साथ सत्यनारायणजी का लंबा आलेख ('भयंकर बमवर्षा के बीच') संलग्न था। यह आलेख अबिसीनिया पर भीषण बमवर्षा का भयावह चित्र प्रस्तुत करता था। पिताजी ने चित्र-सहित वह आलेख 'बिजली' में यथावत् प्रकाशित किया था।
इसके बाद पाँच-छह वर्षों के लिए सत्यनारायणजी फिर गायब हो गये। उनका कुछ पता न चला।...
सत्यनारायणजी का परोक्ष रूप से जिक्र करते हुए एक आलेख में पिताजी ने लिखा है--"मेरे एक मित्र हैं। उनसे मेरी मित्रता लगभग 65 वर्ष पुरानी है। यद्यपि इस लंबी अवधि में केवल चार बार उनसे मेरा मिलना हुआ था, लेकिन मित्रता आरंभ में ही इतनी घनिष्ठ हो गयी थी कि समय के अंतराल का मुझे कभी अनुभव नहीं हुआ। पहले-पहल जब इलाहाबाद में वह हमारे यहाँ आये थे तो एक महीने तक हमारे यहाँ ठहरे थे।"...
(क्रमशः में, क्रमशः)
[चित्र : बिजली में प्रकाशित उस आलेख की क्लिपिंग और युवावस्था के सत्यनारायणजी, जिन्हें मैंने वृद्धावस्था में देखा था]

रविवार, 2 अप्रैल 2017

मिलिये 'मगन'जी से, जो 'नेपाली'जी बन गये...

वो गुजरा हुआ ज़माना...(3)
चीनी-युद्ध के बाद सन् १९६३ में मैंने गोपालसिंह 'नेपाली' के गीत गाकर अपने विद्यालय में खूब यश (और अपयश भी; यश नेपालीजी के गीत से और अपयश अपनी नादानी से) कमाया था। तब मैं छठी कक्षा का छात्र था। नेपालीजी का एक गीत उन दिनों खूब प्रसिद्ध हुआ था --
'शंकरपुरी में चीन ने सेना को उतारा,
चौवालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।'
पटना के मिलर हाई स्कूल में प्रवेश पाते ही पहले दिन, प्राचार्य महोदय की ललकार पर मैंने अपना हाथ खड़ा किया था और उनके बुलावे पर मंच पर गया था। मेरे पास संगीत की कोई विधिवत् शिक्षा तो थी नहीं, लेकिन मैंने अपने एक कान पर हाथ रखकर, तन्मय भाव से, सच्चे सुरों में नेपालीजी का यही गीत गाया था। देश-भक्ति गीत था और उसने सम्मुखीन छात्र-समूह को और प्राचार्य महोदय को प्रसन्न कर दिया था। प्राचार्यजी तो इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने उसी समय मुझे 'तानसेन' की उपाधि देकर सम्मानित किया था। इस प्रसंग का उल्लेख मैंने बाल्यकाल के अपने एक संस्मरण 'तानसेन गवइया अठन्नी...' में किया है।
बहरहाल, जब मैं बड़ा हुआ तो नेपालीजी की रचनाओं को मैंने खोज-ढूँढ़कर पढ़ा और आनंदित हुआ।


इसी साल, जनवरी में पटना गया तो बिहार हितैषी पुस्तकालय, पटनासिटी में सन् १९३७ की 'बिजली' फाइल में उनका एक चित्र और उनकी एक कविता देखी। कविता मेरी पढ़ी हुई नहीं थी। मैं दोनों की क्लिपिंग ले आया हूँ। तब 'नेपालीजी' गोपालसिंह 'नेपाली' के नाम से ख्यात नहीं हुए थे और उन्होंने अपना उपनाम भी 'मगन' रखा हुआ था। 'बिजली' के एक अंक में, 'प्रभात' शीर्षक कविता के नीचे कवि के रूप में उनका नाम छपा है--"श्री बंबहादुर सिंह नेपाली 'मगन'। अपनी प्रारम्भिक रचनाओं की इस छोटी-सी कविता में ही नेपालीजी ने कैसे अनूठे रंग भरे हैं और एक चित्ताकर्षक चित्र खींचकर पाठकों के सामने रख दिया है। इसे आप स्वयं देख लें और मुदित हों। है न यह अतीत के आइने से झाँकता एक रोचक प्रसंग?...
(क्रमशः)
[चित्र : गोपालसिंह 'नेपाली' की युवावस्था का चित्र और उनकी कविता, 'बिजली' की क्लिपिंग]

सोमवार, 27 मार्च 2017

अनजाने-से दिनकर...

वो गुज़रा हुआ ज़माना...(2)
सन् 1972 में जब मैं 'दिनकर की डायरी' की पाण्डुलिपि पर काम कर रहा था और दिनकरजी के पूज्य चरणों में बैठने का मैंने सौभाग्य पाया था, उन्हीं दिनों की बात है। डायरी का काम पूरा होने में डेढ़ महीने लग गये थे। फिर, लोहे की चादर का एक बड़ा-सा बाॅक्स मैंने दिनकरजी के कमरे में रखा देखा था। मेरी जिज्ञासा पर उन्होंने एक शेर सुनाकर मुझसे कहा था--
"चंद तस्वीरें बुताँ, चंद हसीनों के ख़ुतूत
बाद मरने के मेरे घर से सामाँ निकला।'
'हम लेखकों-कवियों के पास और होता ही क्या है! अरे, इसमें बहुत-सी तस्वीरें हैं और पुरानी चिट्ठियों का ज़ख़ीरा है, लेकिन सब गड्डमड पड़ा है !"
मैंने उसे व्यवस्थित करने का जिम्मा स्वयं उठा लिया और दो दिनों के लिए दिनकरजी के कक्ष पर अपना आधिपत्य जमा लिया था। पूरे कमरे में चिट्ठयाँ-ही-चिट्ठयाँ फैल गयी थीं। उसी बक्स से निकली थीं पिताजी की सन् 1937 की तीन-चार चिट्ठियाँ, जिन्हें देखकर मैं रोमांचित हो उठा था। मैंने दिनकरजी को पिताजी के वे पत्र दिखाये तो उन्होंने मुझसे सहज ही कहा था-- "मेरी प्रारंभिक कई कविताएँ मुक्तजी ने ही 'बिजली' में प्रकाशित की थीं।"

पटना में 'बिजली' की पुरानी जिल्द देखते हुए मुझे दिनकरजी के कथन की सत्यता के दर्शन भी हुए थे, जब उनकी कई रचनाएँ मैंने सन् 37 की जिल्द में प्रकाशित देखी थीं । सन् 1937 से 2017-- अस्सी वर्षों का विशाल कालखण्ड, एक युग के अवसान की मार्मिक अनुभूति हुई! अपनी बाल्यावस्था से युवावस्था तक मैंने दिनकरजी को जैसा देखा-जाना था, उस अद्भुत और दिव्य स्वरूप से बिलकुल भिन्न युवावस्था के दिनकरजी मुझे 'बिजली' में मिले और मैं विस्मित-अभिभूत हो उठा। क्या आप बिजली-काल के दिनकरजी के दर्शन नहीं करना चाहेंगे? उनकी प्रकाशित तत्कालीन किसी कविता की क्लिपिंग तो मुझसे हड़बड़ी में छूट गयी है, लेकिन आपके साथ साझा करने के लिए उनकी तस्वीर मैं जरूर साथ ले आया हूँ। संभव है, इस चित्र में दिनकरजी आपको भी अजाने-से लगें। दिनकरजी की किसी पुस्तक, किसी चित्रावली में, कहीं यह चित्र मैंने देखा हो, यह मेरी स्मृति में तो नहीं है।...
(क्रमशः)
(चित्र : सन् 1937 के दिनकरजी, 'बिजली' की फाइल से।)

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

'बिजली' और 'आरती' का वो गुज़रा हुआ ज़माना...

[पूर्वपीठिका]
सन् 1936 में पूज्य पिताजी (पं. प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त') 26 वर्ष के युवा थे। सन् 1934 में, इलाहाबाद में, पितामह के देहावसान के एक साल बाद पिताजी पटना आ गये थे। विद्यालय-महाविद्यालय की कोई डिग्री तो उनके पास थी नहीं, लेकिन कुछ कर गुज़रने का अदम्य उत्साह था उनके मन में। अपने पितृश्री की कृपा-छाया में और जीवन की पाठशाला में उन्होंने जो कुछ अर्जित किया था, विद्वज्जनों के आत्मीय सान्निध्य से जो प्रसाद पाया था, वह स्वाध्याय की आँच में पककर उबल रहा था और ज्ञान-पात्र के किनारों से तड़पकर बाहर आने को अधीर था। कथा-कविता के विशाल फलक पर तब तक 'मुक्त' नाम अंकित हो चुका था। इलाहाबाद के दिनों का अर्जित संपादन-अनुभव ही उनकी पूँजी था।
सन् 35 में जब वह पटना आये, उस समय तक साहित्यिक गतिविधियों के मामलों में बिहार मरुभूमि-समान था। पूर्ववर्ती काल में कलकत्ता ही हिन्दी की साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र बना हुआ था, जहाँ महादेव सेठ के 'मतवाला-मण्डल' में निरालाजी, नवजादिकलाल श्रीवास्तवजी और शिवपूजन सहायजी की तिकड़ी जमी हुई थी। जब यह तिकड़ी टूटी, तब 'मतवाला' के मंच पर पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र'जी अवतरित हुए, लेकिन सेठजी के अवसान के साथ ही 'मतवाला' का तिलस्म भी टूट गया और हिन्दी की गतिविधियों के तीन केन्द्रीय ध्रुव बन गये--इलाहाबाद, वाराणसी और लखनऊ। उन दिनों की याद करते हुए पिताजी ने निरालाजी के अपने संस्मरण "जुही की कली' के कवि : निराला" में लिखा है :
"...फिर बहुत समय बीत गया। हिन्दी के लिए कलकत्ता का वह महत्व न रहा, जो पहले था। उसकी जगह इलाहाबाद, काशी और लखनऊ ने ले ली। शिवपूजनजी काशी जा बसे। नवजादिकलालजी इलाहाबाद आ गये। निरालाजी प्रायः अपने गाँव में रहते, कभी-कभी लखनऊ आ जाया करते थे। उग्रजी अपनी जन्मभूमि में लौट आये थे, लेकिन वहाँ ज्यादा दिन टिके नहीं, बंबई चले गये। 'मतवाला' बंद हो गया और कुछ समय बाद सेठजी ने भी इह-लीला संवरण की।'
"मैं उन दिनों इलाहाबाद में ही था। इलाहबाद, वाराणसी और लखनऊ में हिंदी की गतिविधियाँ तीव्र हो गयी थीं। कलकत्ता की चमक-दमक अब इन त्रिपुरियों ने ले ली थी। बनारस में प्रसादजी और प्रेमचंदजी थे, इलाहबाद में पंतजी और महादेवीजी, लखनऊ का अखाड़ा निरालाजी ने संभाल रखा था। अब निरालाजी से मिलना-जुलना अधिक हो गया।...'
"काल-चक्र घूमता रहा। सन १९३४ में पिताजी का देहावसान हुआ। उसके एक साल बाद, पच्चीस वर्षों से सेवित प्रयाग छोड़कर मैं पटना आ बसा। लम्बे अंतराल के बीच यदाकदा निरालाजी के दर्शन तभी हुए, जब वह पटना या मुजफ्फरपुर के किसी साहित्यिक समारोह में पधारे। उस ज़माने में इलाहाबाद साहित्यिक और राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र था--पटना में साहित्यिक गतिविधि नाम की कोई चीज़ नहीं थी। इलाहबाद छूटा तो साहित्यिकों के संपर्क से भी मैं वंचित हो गया।..."
बिहार की राजधानी पटना से भी कोई स्तरीय साहित्यिक पत्रिका निकले, इस प्रदेश में भी थोड़ी साहित्यिक हलचल हो और हिन्दी की एक मशाल तो जले; इसी अभिप्राय से पिताजी ने सन् 36 में पटना से 'बिजली' नामक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन किया। वह पत्रिका शीघ्र ही चर्चित-समादृत हुई। पिताजी ने 'बजली' के माध्यम से बिहार के सहित्याकाश में ऐसी चपला चमकायी कि उसकी चकाचौंध से प्रभावित होकर उदीयमान लेखकों-कवियों की एक बड़ी जमात उनके साथ आ खड़ी हुई। पिताजी ने दो-ढाई वर्षों तक घोर परिश्रम किया और आर्थिक तंगी से जूझते हुए पत्रिका के प्रकाशन का दायित्व उठाते रहे।

पिछले दिनों मैं पटना गया तो पटनासिटी के बिहार हितैषी पुस्तकालय में मैंने 1936-37 की 'बिजली' की ज़िल्द देखी। आप कल्पना ही कर सकते हैं कि समय के इतने लंबे अंतराल के बाद 'बिजली' के अंकों का दर्शन करके मेरी मनोदशा क्या रही होगी! 1936 अर्थात् वह काल, जब मैं दुनिया से नदारद था। मेरे पास समय कम था और मेरी तलाश/ अनुसन्धान का लक्ष्य कुछ और...; फिर भी 'बिजली' से कुछ क्लिपिंग ले आया हूँ। आगामी कुछ किस्तों में उसी की चर्चा होती रहेगी, उसके अनंतर मासिक 'आरती' की भी।... और मुझे आशा है, उससे जुड़े रहना आपको प्रीतिकर लगेगा।...
(क्रमशः)
(चित्र : 'बिजली' का मुखपृष्ठ)